
*???????????????? विश्व के प्राचीनतम सात नगर हैं????????????*
जिन्हें प्राचीन सप्तपुरी कहते हैं।
???? ये सप्तपुरियाँ हैं अयोध्या,मथुरा,माया(हरिद्वार)काशी,कांची, अवंतिका(उज्जैन) और पुरीद्वारा( जगन्नाथपुरी )।
इन पुरियों का वर्णन स्कन्दपुराण, विष्णुपुराण और मत्स्यपुराण में तो है ही, ऋग्वेद में भी मिलता है !
कहते हैं कि अखण्ड भारतवर्ष आर्यावर्त के 13 देशों में तो इन पुरियों के समान कोई नगर था ही नहीं , विश्व में भी कहीं नहीं था।
इन सप्तपुरियों में से अयोध्या,मथुरा और काशी को प्राचीन वैभव प्रदान करने में योगी और मोदी जुटे हुए हैं।
चूंकि ये तीन पुरियाँ यूपी में हैं और चुनाव भी यूपी में हैं,तीनों पुरियों पर हजारों करोड़ खर्च हो रहा है तो चर्चा भी खूब है।
काश ! बाकी चार पुरियों की सुध भी 2024 से पहले ले ली जाए।
बहुत संभावना है कि योगी आगामी चुनाव मथुरा से लड़ जाएँ।
वैसे वे अयोध्या से भी लड़ सकते थे, पर भाजपा को मथुरा उससे भी अधिक जरूरी लगती है।
अयोध्या का विकास विश्वनगरी के रूप में शुरू हुआ।
काशी तो पहले ही विश्व की प्राचीनतम नगरी के रूप में विकसित हो चुकी है।
असल बारी भगवान कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा की है।
मथुरा वृंदावन को अंतरराष्ट्रीय संस्था इस्कॉन की मार्फ़त पूरी दुनिया समझ और जान गई है।
” हरे रामा हरे कृष्णा ” आंदोलन दुनिया के 155 देशों में पल्लवित है।
लाखों ईसाइयों ने स्वेच्छा से कृष्णभक्ति स्वीकार कर ली है।
जाहिर है कृष्ण की जन्मभूमि को संसार के सामने भव्य रूप में प्रस्तुत करना देश की सरकार का दायित्व है।
पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए यह जरूरी है ।
✊ यह विचित्र संयोग ही है कि मुगल आक्रांताओं ने राम,कृष्ण और शिव के तीन विराट आस्थास्थल तोड़े और तीनों यूपी में हैं।
दक्षिण भारत के चार राज्यों में तो अत्यंत विशाल और विराट मंदिरों की अद्भुत श्रंखला आज भी मौजूद है।
चूंकि आक्रांता तहस नहस मचाने के लिए वहाँ पहुंच न पाए तो सब मूल रूप में मौजूद है।
शेष चार पुरियों में हरिद्वार गंगातीर्थ था
और तोड़ने के लिए वहाँ मंदिर थे ही नहीं।
कांची और पुरी तक मुगल पहुँचे नहीं, जबकि महाकाल की नगरी उज्जैन के महाकाल मंदिर तक मराठों ने उन्हें पहुँचने नहीं दिया।
तो जो टूटा वह बन रहा है।
इतनी सी ही बात है।
लेकिन बुरा हो राजनीति का।
मजहब के आधार पर देश के बंटवारे के बाद हिन्दुस्तान की सरकार को देश के मानबिंदुओं की पुनर्स्थापना का जो काम वार्ता के आधार पर करना चाहिए था, वह न कर पाई।
केवल अपनी जिद और आत्मिक ताकत के दम पर पटेल ने सोमनाथ मंदिर का नवनिर्माण कराया।
तो वही हुआ जो होना था।
अपने आस्था स्थलों के नवनिर्माण का काम जनता को खुद अपने हाथों में लेना पड़ा।
तो अयोध्या और काशी के बाद अब मथुरा की बारी है।
बुरा न मानिए यह दिलों की बात है।
अब यदि राजनीति इसे कैश कर ले तो बुरा मानने की जरूरत नहीं।
यह स्वाभाविक है।
यह सरकार देश की जनता के लिए बहुत कुछ कर रही है,अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रौशन कर रही है।
तो अगर 70 साल बाद कोई सरकार देश की अस्मिता से जुड़े मानबिन्दुओं का पुनर्स्थापन करना चाहे तो उसका स्वागत होना चाहिए।
इतिहास और सच्चा इतिहास सामने होगा,
तभी तो अतीत को साथ लेकर मानवजाति
विकास पथ पर आगे बढ़ेगी ?
हम केवल तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालयों को आतताइयों द्वारा नष्ट करने की बात सुनते आए हैं।
यह सब इतिहास में है।
अरे साहब इतिहास में और भी बहुत कुछ है,
जिसे पहले मुगल इतिहासकारों ने छिपाया,
फिर अंग्रेजों ने छिपाया और फिर जिसे वामपंथी
इतिहासकारों ने विद्रूप रूप में शर्मनाक ढंग से
प्रस्तुत किया।
नीचे हम उन महान शिक्षण संस्थाओं के चित्र
दे रहे हैं,जिन्हें खाक में मिलाकर आक्रांताओं
और औरंगजेब ने भारत की संस्कृति को मिटाने
का षड्यंत्र रचा।
लेकिन मोदी ने ठीक कहा कि जब जब औरंगजेब आएंगे,शिवाजी भी आएंगे और महाराणा प्रताप भी।
अतीत और वर्तमान को सुधारकर इतिहास को सुधारने का महायज्ञ प्रारम्भ हुआ है।
सभी राष्ट्रवादियों को उसमें आहुति डालनी पड़ेगी।
जी हाँ ! देश मातृभूमि के बहुत सारे ऋण इन दिनों चुका रहा है।
हर हर महादेव
यह रचना मेरी नहीं है मगर मुझे अच्छी लगी तो आपके साथ शेयर करने का मन हुआ।????????





